HINDI

Maujood

Book information

Year
2015
ISBN
9788183616966
Language
hindi
Format
PDF
Filesize
3 MB (2631408 bytes)
Pages
124\124
Time added
2021-02-27 16:58:08

Description

कवर पेज शीर्षक पृष्ठ कॉपीराइट पृष्ठ भूमिका अनुक्रम हर मुसाफ़िर है सहारे तेरे मेरा एक पल भी मुझे मिल न सका ये हर सू जो फ़लक-मंज़र खड़े हैं अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ ज़िन्दगी उम्र से बड़ी तो नहीं हाथ ख़ाली हैं तेरे शहर से जाते-जाते मुझे डुबो के बहुत शर्मसार रहती है सवाल घर नहीं बुनियाद पर उठाया है धूप बहुत है मौसम जल-थल भेजो ना सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए नाम लिक्खा था आज किस-किस का सिर्फ़ सच और झूठ की मीज़ान में रक्खे रहे जितने अपने थे सब पराए थे हाशिए पर खड़े हुए हैं हम उँगलियाँ यूँ न सब पे उठाया करो सर पर सात आकाश, ज़मीं पर सात समन्दर बिखरे हैं पहली शर्त जुदाई है सूरज टूट के बिखरा है दरमियाँ एक ज़माना रक्खा जाए नील पड़ते रहें जबीनों पर हमें दिन-रात मरना चाहिए था ये देखो किरचियाँ हैं आइनों की मौसम की मनमानी है बारिश, दरिया, सागर, ओस सर पर बोझ अँधियारों का है मौला ख़ैर एक ख़ुदा है एक पयम्बर एक किताब हमें अब इश्क़ का चाला पड़ा है यहाँ पर ख़त्म हैं ऊँची उड़ानें अपने दीवारो-दर से पूछते हैं कौन वारिस है छाँव का आख़िर हमने ख़ुद अपनी रहनुमाई की इश्क़ के कारोबार में हमने उसे अबके वफ़ाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी हँसते रहते हैं मुसलसल हम-तुम मेरी तेज़ी मेरी रफ्तार हो जा नींदें क्या-क्या ख़्वाब दिखाकर ग़ायब हैं मौत की तफ़्सील होनी चाहिए दाव पर मैं भी दाव पर तू भी शाम से पहले शाम कर दी है पुराने दाँव पर हर दिन नए आँसू लगाता है सफ़र में जब भी इरादे जवान मिलते हैं बढ़ गई है कि घट गई दुनिया हौसले ज़िन्दगी के देखते हैं नदी ने धूप से क्या कह दिया रवानी में शाम होती है तो पलकों पे सजाता है मुझे बैठे-बैठे कोई ख़याल आया मेरे मरने की ख़बर है उसको मौक़ा है इस बार रोज़ मना तेहवार अल्लाह बादशाह दुआओं में वो तुम्हें याद करने वाला है किसने दस्तक दी है दिल पर कौन है हवा ख़ुद अबके हवा के ख़िलाफ़ है जानी रात बहुत तारीक नहीं है अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है शराब छोड़ दी तुमने कमाल है ठाकुर काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं मुझमें कितने राज़ हैं बतलाऊँ क्या दर-बदर जो थे वो दीवारों के मालिक हो गए उठी निगाह तो अपने ही रू-ब-रू हम थे मसअला प्यास का यूँ हल हो जाए ऊँघती रहगुज़र के बारे में मुहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा बूढ़े हुए यहाँ कई अय्याश बम्बई वो कभी शहर से गुज़रे तो ज़रा पूछेंगे अँधेरे चारों तरफ़ सायँ-सायँ करने लगे पाँव से आसमान लिपटा है नज़ारा देखिए कलियों के फूल होने का इधर की शै उधर कर दी गई है अन्दर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए मौसम बुलाएँगे तो सदा कैसे आएगी यहाँ कब थी जहाँ ले आई दुनिया ज़िन्दगी की हर कहानी बे-असर हो जाएगी पुराने शहर के मंज़र निकलने लगते हैं धर्म बूढ़े हो गए मज़हब पुराने हो गए शजर हैं अब समर-आसार मेरे तेरे वादे की तेरे प्यार की मुहताज नहीं मेरे अख़लाक़ की एक धूम है बाज़ारों में बरछी लेकर चाँद निकलने वाला है सबको दुख से मुक्ति मिलने वाली है दो गज़ टुकड़ा उजले-उजले बादल का गीला दामन गीली-गीली आँखें हैं तेरा-मेरा नाम ख़बर में रहता था सुस्ताती है गर्मी जिसके साए में दिये जलाए तो अंजाम क्या हुआ मेरा बलन्दियों के सफ़र में ये ध्यान आता है एक नया मौसम नया मंज़र खुला मैं ख़ुद अपने-आप ही में बन्द था मौसमों का ख़याल रक्खा करो ख़ाली-ख़ाली उदास-उदास आँखें मुर्ग़ माही कबाब ज़िन्दाबाद मुआफ़िक़ जो फ़िज़ा तय्यार की है चिराग़ों का घराना चल रहा है समन्दर से किसी दिन फिर मिलेंगे तूफ़ाँ तो इस शहर में अक्सर आता है सूख चुका हूँ फिर भी मेरे साहिल पर ख़ाक से बढ़कर कोई दौलत नई होती ज़मीं बालिश्त भर होगी हमारी सबको रुसवा बारी-बारी किया करो जितना देख आए हैं अच्छा है, यही काफ़ी है कैसा नारा कैसा क़ौल अल्लाह बोल ऊँचे-ऊँचे दरबारों से क्या लेना ये आईना फ़साना हो चुका है सबब वो पूछ रहे हैं उदास होने का

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