स्त्री विमर्श : प्रतिनिधि कविताएँ (Hindi Edition)
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‘स्त्री विमर्श’ एक ऐसी आवाज़ जो रुढ़िवादी विचारधाराओं, जनरीतियों, प्रथाओं, मान्यताओं और स्त्री के लिए पुरुषप्रधान व पितृसत्तात्मक समाज द्वारा बनाए गए नियमों, कानूनों के विरुद्ध उत्पन्न होती है | ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ में महादेवी वर्मा कहती हैं कि “ स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर जीवित रहना चाहती है, न देवता की मूर्ति बनकर प्राण प्रतिष्ठा चाहती है । कारण वह जान गई है की एक का अर्थ अन्य की शोभा बढ़ाना है तथा उपयोग न रहने पर फेंक दिया जाता है तथा दूसरे का अभिप्राय दूर से उस पुजापे का देखते रहना है, जिसे उसे न देकर उसी के नाम पर लोग बाँट लेंगे । “स्त्री विमर्श एक वैश्विक विचार धारा है, विश्व भर में साहित्यकारों, कवियों द्वारा ‘स्त्री विमर्श’ के विषय पर लिखा गया है और लिखा जा रहा हैं | भारत में कई साहित्यकारों और कवियों द्वारा स्त्री विमर्श के विषय पर बेबाकी से स्त्री की पीढ़ा को लिखा और सजीव चित्रण किया गया है | प्रस्तुत काव्य संकलन ‘स्त्री विमर्श- प्रतिनिधि कविताएँ’ भारत के नवीन कवियों की रचनाओं का संकलन हैं जो कि विभिन्न माध्यमों, सूचनाओं और पोर्टल्स के माध्यम से संकलित किया गया है | आशा है कि भारतीय काव्य परिपेक्ष्य में स्त्री विमर्श को समझने के लिए ये काव्य संकलन सहायक होगा | 1-स्त्री सुशीला टाकभौर 2-मेरा मरद जानता है रंजना जायसवाल 3-एक औरत के यकीन मनीषा कुलश्रेष्ठ 4-मुनिया अंजना बक्शी 5-फ़र्ज़ का अधिकार आलोकिता 6-मैं आधुनिक नारी हूँ रणदीप चौधरी ‘भारत्पुरिया’ 7-औरत पंकज कुमार साह 8-स्त्री और पुरुष अमिता प्रजापति 9-पर स्त्री सुदर्शन प्रियदर्शिनी 10-स्वीकृति इला प्रसाद 11-औरत होना अनीता भारती 12-शायद किसी दिन चंद्रकला त्रिपाठी 13-एक और सुबह हो गई शैलजा पाठक 14-नारी कोई भीख नहीं देवी नागरानी 15-नारी अर्चना 16-हाँ गर्व है मुझे मैं नारी हूँ सोनी कुमारी 17-क्योंकि मैं स्त्री हूँ बेबाक लक्ष्मी अज्ञात 18-नारी शक्ति प्रज्ञा श्रीवास्तव 19-औरत आखिर क्या तेरी कहानी अंकिता आशू 20-मैं चाहती हूँ पूनम तुषामड़ 21-दरवाज़ा अनामिका 22-क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए निर्मला पुतुल 23-कोई तो कारण था राजी सेठ 24-मेरा घर पूर्णिमा वर्मन 25-तुमने कहा था माँ डॉ० पूनम गुप्त 26-नारी हूँ मैं अंजना 27-मर्यादा क्या है नीति झा 28-आया समय उठो तुम नारी शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान 29-वह भी चाहती हैं चन्द्र मोहन किस्कु 30-सबला नारी डी० के० निवातिया 31-नींद में स्त्री विनय कुमार 32-मेरा अपना कोना स्नेहमय चौधरी 33-खामोश रहने वाली लड़कियांहरप्रीत कौर 34-गाँव देहात की बेटियां नीरा परमार 35-लोटने के इन्तजार में प्रीतम कौर 36-हज़ार क़दमों की रफ़्तार से जयदेव पट्टी 37-अधुकार हनन सोनी श्री 38-लड़की,नारी,स्त्री सुलोचना वर्मा 39-औरत क्यों घबराए नरेंद्र कुमार 40-खांटी घरेलू औरत ममता कालिया 41-औरत हूँ इसलिए मुकेश वर्मा 42-महज़ औरत आसुतोष कुमार ------------------- कुछ कहूँ ... बदचलन तो न कहोगे ...? शायद कह भी दो या फिर ... रखोगे किसी एक खाने में दिल के मेरे लिए ये सोच कि कहीं मैं बदचलन तो नहीं ...! चलो कह ही देती हूँ सुनो... मैं भी तुम्हारी तरहां , रहना चाहती हूँ आज़ाद और आज़ाद मिज़ाज़ जैसे के तुम रहते हो तमाम उसूलूं , पर्दों को रखके बलाये ताक़.....| -एक अधूरी मौत
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